बाई
कामवाली बाई को मेरा काम छोड़े हुए अभी मात्र ह़फ़्ता भर हुआ था, पर इन सात दिनों में मेरे घर की ज्योग्राफ़ी बदलने लगी थी. ‘बाई खोजो’ अभियान पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा था. अपने स्टाफ़ की सभी सहयोगी टीचर्स, पति के दोस्तों, परिचितों, पड़ोसियों सभी से मैं एक अच्छी बाई दिलवाने की गुहार लगा चुकी थी, पर मेरे इस बुरे व़क़्त में न मेरे पड़ोसी काम आए, न शुभचिंतक. आख़िरकार एक ख़ुशनुमा सुबह मेरे स्कूल की चपरासिन ने मुझे आकर ख़ुशख़बरी दी कि बाई मिल गई है. “अरे वाह! गोदावरी कब ले के आएगी बाई को?” “मैडमजी साथ ही लेकर आई हूं, ऐ सीमली इधर आ…” उसने जब अपने पीछे खड़ी बारह-तेरह साल की लड़की को मेरे सामने किया, तो मेरी ख़ुशी कपूर-सी उड़ गई. “ये!… क्या काम कर पाएगी?” “काम करवाकर देख लो मैडमजी, नहीं समझ में आवे तो मत रखना. कल अपनी मां के साथ आ जाना री छोरी.” दूसरे दिन सीमली अपनी मां के साथ आ गई. उसकी मां तनख़्वाह आदि की बात करके उसे छोड़ कर चली गई, दस उपदेशों के साथ “ठीक से काम करजे री छोरी. मैडम साबजी डांट के राख जो. पहले भी कई घरां में काम किया, पर इसका जी काम में कम खेलबा में ज़्यादा रह छै.” जिसके लिए यह सब कहा जा रह...